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आरक्षण – 10 सवाल और जवाब जो आपको पढ़ने चाहिए

Read in English from Reservation – 10 Questions And Answers That You Should Read

प्रश्न : आरक्षण क्या है? 

आरक्षण शब्द एक मिथ्य है। इसके लिए भारतीय संविधान में इस्तेमाल किया गया उचित शब्द प्रतिनिधित्व है। यह किसी को उसकी व्यक्तिगत क्षमता के लिए प्रदान नहीं किया जाता है। यह वंचित समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में एक व्यक्ति को प्रदान किया जाता है। आरक्षण के लाभार्थियों से यह आपेक्षा की जाती है की वे बदले में अपने समुदायों को आगे लाने में मदद करें 

प्रश्न : आरक्षण क्यों? 

आरक्षण की नीति का प्रयोग एक ऐसी रणनीति के तौर पर होना चाहिए जिससे भेदभाव दूर हो तथा एक प्रतिपूरक अभ्यास के रूप में कार्य करे। छुआछूत प्रथा के कारण समाज के एक बड़े वर्ग को संपत्ति, शिक्षा, व्यापार एवं नागरिक अधिकारों के अधिकार से ऐतिहासिक रूप से वंचित रखा गया था। ऐतिहासिक इनकार की भरपाई करने एवं भेदभाव के खिलाफ सुरक्षित उपाय करने के लिए, हमारे पास आरक्षण नीति है। 

प्रश्न : क्या संविधान के संस्थापकों द्वारा केवल पहले १० वर्षों के लिए आरक्षण को शामिल किया गया था? 

केवल राजनीतिक आरक्षण (लोकसभा, विधानसभा आदि में आरक्षित सीटें) को १० वर्षों के लिए आरक्षित किया जाना था और उसके बाद नीतिगत समीक्षा की जानी थी। यही वजह है कि हर १० वर्षों के पश्चात संसद राजनीतिक आरक्षण को बढ़ाती है। 

आरक्षण के लिए १० वर्षों की सीमा शिक्षा एवं रोजगार में आरक्षण के लिए सत्य नहीं है। शिक्षण संस्थानों एवं रोजगार में आरक्षण को कभी भी विस्तार नहीं दिया जाता जैसा कि राजनीतिक आरक्षण के लिए दिया जाता है। 

प्रश्न : जाति के आधार पर आरक्षण क्यों दें? 

इस सवाल का जवाब देने के लिए, हमें सर्वप्रथम यह समझना होगा कि आखिर आरक्षण की आवश्यकता उत्पन्न ही क्यों हुई है। भारत में वंचित जातियाँ जिस प्रकार की समस्याओं का सामना करती आयीं हैं/ कर रहीं हैं, उसका कारण धार्मिक स्वीकृति पर आधारित जाति प्रणाली का होना है, जिसका व्यापक परिमाण ऐतिहासिक पराधीनता है । इसलिए यदि जाति व्यवस्था ही दलित-बहुजनों की सभी असामर्थ्यताओं, अन्याय एवं असमानताओं का प्रमुख कारण था, तो इन सभी असामर्थ्यताओं को दूर करने के लिए समाधान भी केवल जाति के आधार पर ही तैयार किया जाना चाहिए। 

प्रश्न आर्थिक कसौटी के आधार पर क्यों नहीं? 

निम्नलिखित कारणवश आरक्षण किसी भी प्रकार से आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं होना चाहिए: 

) दलित-बहुजनों में व्याप्त गरीबी की उत्पत्ति जाति व्यवस्था पर आधारित सामाजिक-धार्मिक पृथक्करनों के कारणवश है। अतः गरीबी एक परिणाम है जिसका कारण जाति व्यवस्था है। इसीलिए समाधान कारण का होना चाहिए न की परिणाम का।  

) किसी भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बदल सकती है । कम आय का अर्थ गरीबी हो सकती है । परंतु भारत में धन का क्रय मूल्य जाति पर भी निर्भर करता है । उदाहरणत: एक दलित कई स्थानों पर एक प्याली चाय भी नहीं खरीद सकता है। 

व्यक्ति की आर्थिक स्थिति साबित करने में राज्य के तंत्र की कई व्यावहारिक कठिनाइयां हैं। इससे कमज़ोर को समस्या हो सकती है 

घ) जाति ग्रस्त भारत में, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है, यहां तक कि जाति जैसी अपरिवर्तनीय स्थिति के लिए भी जहां बनावटी “जाति प्रमाण पत्र” तक खरीदा जा सकता है, वहाँ बनावटी “आय प्रमाण पत्र” खरीदना कितना ही आसान होगा? इसलिए, आय आधारित आरक्षण पूर्णतः अव्यवहारिक है। इस पर बहस करने का कोई लाभ नहीं है जब की दोनों प्रमाण पत्र खरीदे जा सकते हैं तो केवल जाती को ही आरक्षण का आधार क्यों बनना चाहिए? निश्चित रूप से, क्यूंकि बनावटी आय प्रमाण पत्र की तुलना में बनावटी जाति प्रमाण पत्र खरीदना थोड़ा अधिक कठिन है। 

ई) आरक्षण अपने आप में अंत नहीं है, यह अंत करने का एक साधन है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज के सभी क्षेत्रों में “सामाजिक रूप से बहिष्कृत” मानव जगत द्वारा सक्रिय भागीदारी को साँझा करना है। यह सभी बीमारियों के लिए कोई सर्वरोगहारी नहीं है, न ही यह स्थायी है। यह तब तक के लिए एक अस्थायी उपाय होगा जब तक अखबारों में वैवाहिक कॉलम के विज्ञापनों में जाति का उल्लेख होता रहेगा। 

प्रश्न क्या यहाँ क्रीमी परत मापदंड होना चाहिए या नहीं? 

आरक्षण विरोधियों द्वारा क्रीमी लेयर की मांग करना आरक्षण की पूरी प्रभावशीलता को विफल करने की एक चाल है ।अभी भी आईआईटी में एससी/एसटी के लिए आरक्षित सभी सीटों में से २५४०% सीटें खाली रहती हैं क्योंकि ऐसा प्रतीत होता  है कि आईआईटी को उपयुक्त उम्मीदवार ही नहीं मिलते हैं। जरा सोचिए, तब क्या होगा जब क्रीमी परत का मापदंड लागू होगा, एससी/एसटी मध्यम वर्गनिचला मध्यम वर्ग के वे लोग जो सभ्य शिक्षा लेने की स्थिति में हैं, उन्हें आरक्षण लाभ लेने से वंचित कर दिया जाएगा। क्या अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के गरीब छात्र उन `विशेषाधिकार प्राप्त छात्रों` से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे जो कि रमैय्या से प्रशिक्ष प्राप्त किए हुए है या फिर कोटा के विभिन्न आईआईटी-जेईई प्रशिक्षण केंद्रों से? 

बिलकुल नही. इसका परिणाम यह होगा कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित आईआईटी की १०० प्रतिशत सीटें खाली रह जाएंगी 

प्रश्न आरक्षण कब तक जारी रखना चाहिए? 

इस सवाल का जवाब आरक्षण विरोधियों के पास है। जो इस बात पर निर्भर करता है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं विधायिका में “विशेषाधिकार प्राप्त जातियों” के गठन वाले नीति-नियंता कितनी ईमानदारी एवं प्रभावी ढंग से आरक्षण नीति को लागू करते हैं। 

क्या यह सिर्फ उन “विशेषाधिकार प्राप्त जातियों” के हिस्से में है, जो पिछले ३००० वर्षों से अघोषित एवं अनन्य आरक्षण का लाभ उठाते आ रहे है और आज २१वीं सदी में भी सभी धार्मिक संस्थानों एवं पूजा स्थलों का संपूर्ण उपभोग कर रहे हैं| वे अब आरक्षण नीति की समयसीमा पूछ रहें हैं? 

वे यह क्यों नहीं पूछते, कि धार्मिक संस्थाओं एवं पूजा स्थलों में किसी समुदाय विशेष के लिए विशेष आरक्षण कब तक जारी रहेगा? 

जिन लोगों को ३००० वर्षों से अमानवीय अधीनता के कारण असामर्थ्यता प्रदान हुई है, उन्हें उन असामर्थ्यता से पार पाने के लिए पर्याप्त समय की भी आवश्यकता होगी । ३००० वर्षों की पराधीनता की तुलना में ५० वर्षों की थोड़ी सकारात्मक कार्रवाई कुछ भी नहीं है। 

प्रश्न : क्या जातियों पर आधारित आरक्षण से समाज में विभाजन नहीं होगा? 

ऐसी आशंकाएं हैं कि आरक्षण से समाज में विभाजन बढ़ेगा। ये आशंकाएं पूरी तरह तर्कहीन हैं । समाज पहले से ही अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ है । इसके विपरीत, आरक्षण से जाति व्यवस्था का सफाया करने में मदद मिलेगी ।एससी/एसटी एवं ओबीसी में करीब पांच हजार जातियां हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की तीन व्यापक श्रेणियों के तहत आने वाली ५०००अलग-अलग जातियों का एक समूह बनाकर इनके बीच के मतभेद को कम किया जा सकता है। जातियों का अंत करने का यह सबसे अच्छा तरीका है

इसलिए, आरक्षण द्वारा सामाजिक विभाजन होना, ऐसी बयानबाजी करने के बजाय आरक्षण विरोधियों को जातियों का सफाया करने के लिए ईमानदार एवं वास्तविक प्रयास करने चाहिए। क्या इन लोगों ने इस दिशा में कोई प्रयास किया है? अधिकांश मामलों में, इसका उत्तर नहीं है। आरक्षण विरोधी बयानबाजी कर रहे लोग, इस समय उन सभी विशेषाधिकारों का लाभ ले रहें है जो भारतीय जाति व्यवस्था “विशेषाधिकार प्राप्त जातियों” को प्रदान करती है । जब तक उन्हें जाति व्यवस्था के विशेषाधिकारों का लाभ मिलता रहता है, तब तक उन्हें इससे कोई परहेज नहीं है। लेकिन जब सामाजिक समानता प्राप्ति हेतु जातियों के आधार” पर प्रतिनिधित्व करने की बात आती है तो ये लोग शोर मचाने लगते हैं । ये विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के द्वारा प्रचलित उच्चतम क्रम के दोहरे मापदंड हैं। 

प्रश्न : क्या आरक्षण योग्यता को प्रभावित नहीं करेगा? 

जहां तक योग्यता का सवाल है, इसे बहुत ही संकीर्ण अर्थों में परिभाषित किया गया है तथा, इसका वास्तव में क्या अर्थ है, इसका संबंध आईआईटी कानपुर के प्रो. राहुल बर्मन द्वारा लिखे गए एक लेख के निम्नलिखित उद्धरण में पता चलता है: 

पिछले ५० वर्षों से दक्षिण भारत के चार राज्यों में ६०% से अधिक एवं महाराष्ट्र में लगभग ४०% आरक्षण मौजूद है  वहीं दूसरी ओर, उत्तर भारतीय राज्यों में १५% विशेषाधिकार प्राप्त जातियां ही शैक्षिक संस्थानों और रोजगार में ७७% सीटों का लाभ ले रही हैं (यह मानते हुए कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए २३ % आरक्षण सीटें पूरी तरह से भरी हु हैं, जो कि असल में नहीं हैं)। विश्व बैंक के अध्ययन में पाया गया है कि सभी चार दक्षिण भारतीय राज्य अपने मानव विकास सूचकांक के मामले में उत्तर भारतीय राज्यों से काफी आगे हैं। यह एक सामान्य ज्ञान है कि उत्तर भारतीय राज्यों की तुलना में गरीबी उन्मूलन योजनाओं आदि को लागू करने में शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिक विकास आदि के क्षेत्र में सभी दक्षिणी राज्य और महाराष्ट्र काफी आगे हैं । इससे पता चलता है कि आरक्षण ने वास्तव में दक्षिण भारतीय राज्यों को विभिन्न मोर्चों पर प्रगति करने में मदद की है। जबकि उत्तर भारतीय राज्यों में विकास की कमी के लिए पर्याप्त आरक्षण की कमी जिम्मेदार है 

प्रश्न १०: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए मौजूदा आरक्षण प्रभावी रहा है या नहीं ? 

सार्वजनिक क्षेत्र में आरक्षण नीति से काफी लोगों को फायदा हुआ है । केंद्र सरकार में १४ लाख कर्मचारी हैं । तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में अनुसूचित जातियों का अनुपात १६% के कोटे से काफी ऊपर है और पहली और दूसरी श्रेणी में यह अनुपात ८-१२% के आसपास है । इसलिए आज हम मध्यम एवं निम्न मध्यम वर्ग में हम जिस दलित समुदाय को देखते हैं, वह आरक्षण के कारण है  

अनुवाद: Pariah Street का अज्ञातकृत दोस्त 

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