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“जाती” और “नस्ल” – दो अलग तरह के भेदभाव लेकिन अनगिनत समानताएं

यूरोपीय मूल के लोगों द्वारा अफ्रीकी मूल के अश्वेत लोगों के साथ किया जाने वाला नस्लीय भेदभाव हो या भारतीय उपमहाद्वीप की पिछड़ी और अनुसूचित जातियों का ब्राह्मणों द्वारा किया जाने वाला जातीय भेदभाव। ऊपरी तौर पर अलग दिखने के बावजूद, बुनियादी तौर पर यह लगभग एक ही तरह की गैर-बराबरी पर आधारित है। इन मानवता विरोधी विचारधाराओं के खिलाफ आक्रामक संघर्ष हुए, जो आज भी जारी हैं।

अफ्रीकी लोगों के नस्ल-विरोधी संघर्ष को ज़्यादा जाना गया। भारत की शूद्र(OBC) और अति-शूद्र(SC-ST) बनाई गई जातियों के ब्राह्मणवाद विरोधी संघर्ष के बारे में विश्व स्तर पर लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन यह संघर्ष अफ्रीकी लोगों के संघर्ष से कही ज़्यादा पुराना, मुश्किल और खतरनाक रहा है। अफ्रीकी लोगों का संघर्ष 15वी -16वी  शताब्दी में शुरू हुआ। जब यूरोपीय लोगों ने अमरीकी महाद्वीप पर वहां के मूलनिवासी लोगों को हराकर अपना शासन स्थापित किया, तो उन्हें बड़ी संख्या पर खेतों में काम करने वाले मज़दूरों की ज़रूरत पड़ी। इसे वो अफ्रीका से अश्वेत लोगों को लाकर पूरा करने लगे। उन्हें ग़ुलामों भरी ज़िन्दगी जीने पर मजबूर किया गया और सदियों तक उन पर अन्याय-अत्याचार किये गए।

“जाती” 3 हज़ार साल से भी पुराणी व्यवस्था

भारत की जाती व्यवस्था तीन हज़ार साल से भी पुरानी है। इसकी शुरुआत भारत में आर्यों के आने के बाद से शुरू हुई। इन्होंने भारत के मूलनिवासियों को अपने वैदिक धर्म के अनुसार शूद्र बनाकर सबसे निचे धकेल दिया और उसे बाकि के तीनों वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य की सेवा करने पर मजबूर किया। समय के साथ ब्राह्मणों ने इस समाज को तोड़े रखने के लिए 6000 से भी ज़्यादा जातियां बनाई ताकि वह कभी एकजुट होकर बगावत न कर सकें।

शुरुआती संवाद

आधुनिक भारत में महात्मा जोतीराव फूले ने 1848 में जाती व्यवस्था के खिलाफ पश्चिम भारत में शुरुआत की। जब उनका आंदोलन ज़ोर पकड़ा तो उन्होंने “गुलामगिरी” नाम की एक क्रांतिकारी किताब लिखी। यह अदभुत बात है कि उन्होंने इसे अमरीका में यूरोपीय लोगों द्वारा अफ़्रीकी लोगों की ग़ुलामी को खत्म करने के लिए किये गए गृह युद्ध(Civil War) को समर्पित किया। यह उम्मीद जताई कि इससे प्रेरणा लेकर भारत के लोग भी अपने शूद्र -अतिशूद्र भाइयों को ब्राह्मणों की ग़ुलामी से आज़ाद करवाएंगे। “गुलामगिरी” जिसे अंग्रेजी भाषा में “Slavery” कहा जाता है, यह शब्द अफ्रीकी लोगों के अमरीका में संघर्ष का केंद्र रहा। जिस तरह अफ़्रीकी मूल के लोग, यूरोपीय मूल के लोगों के ग़ुलाम थे; उसी तरह भारत में शूद्र और अति-शूद्र ब्राह्मणों के ग़ुलाम थे। महात्मा जोतीराव फुले इस बात को 19वी सदी में ही समझ चुके थे।

महात्मा जोतीराव फूले से शुरू होकर यह लड़ाई छत्रपति शाहू जी महाराज, नारायणा गुरु, बाबासाहेब अम्बेडकर, पेरियार, साहब कांशी राम तक होती हुई आज भी बदस्तूर जारी है। वहीं अफ्रीकी-अमरीकी नेताओं का उभार 1860 के दशक में हुए गृह युद्ध के बाद से होना शुरू हुआ। इसमें फ्रेडेरिक डगलस, बुकर टी वाशिंगटन, मार्कस गार्वी, W. E. B. Du Bois, मार्टिन लूथर किंग और मैलकम X  जैसे महान नेताओं ने अपनी भूमिका निभाई।

ग़ुलामी का मूल कारण

इन सभी नेताओं को इस बात का अहसास था कि इस ग़ुलामी का मूल कारण मानसिक हैं न कि शारीरिक। जब तक अश्वेत और शूद्र-अतिशूद्र अपने आपको कम दर्जे का इंसान समझते रहेंगे, वो अपनी ग़ुलामी का अंत नहीं कर सकते। उन्होंने सबूत दिए कि वर्तमान में चाहे वो ग़ुलाम हों, लेकिन उनका अतीत गौरवमय था। अश्वेत नेताओं ने बताया कि अफ्रीका दुनिया की सबसे प्राचीनतम सभ्यता है और मिस्र के पिरामिड उनके ही पूर्वजों द्वारा बनाये गए थे। जिस समय यूरोप के गोरी नस्ल के लोग जंगली जीवन जी रहे थे, अश्वेत लोग महानतम सभ्यताओं को जन्म दे चुके थे। महात्मा फुले और दूसरे बहुजन महापुरुषों ने भी ब्राह्मणों के भारत आने से पहले, यहां के मूलनिवासी लोगों के गौरवमय इतिहास के बारे में जानकारी दी। बाबासाहब ने बौद्ध काल का ज़िक्र किया, जिसने पूरी दुनिया में भारत को विश्व गुरु के तौर पर स्थापित किया और जिसे स्वर्णिम काल कहा गया।

अद्भुत समानताओं वाले दो महान नेता

दोनों आंदोलनों में दो ऐसे नेता हुए, जिनके विचारों में अदभुत समानता मिलती है। मैलकम X, जिनका जन्म मई 19, 1925 को अमरीका के नेब्रास्का प्रान्त के ओमाहा शहर में हुआ था और कांशी राम, जिनका जन्म 15 मार्च, 1934 को भारत के पंजाब प्रान्त के रोपड़ जिले में हुआ। 3 अप्रैल 1964 को अमरीका के क्लीवलैंड शहर में अपने एक बहुत ही चर्चित भाषण में मैलकम X ने कहा कि वो “बैलट”(वोट) के पक्ष में हैं, लेकिन अगर अपनी आज़ादी हासिल करने के लिए बुलेट(बंदूक) का भी सहारा लेना पड़ा, तो वो उसके लिए भी तैयार हैं। 14 अप्रैल 1994 को नागपुर में बाबासाहब अम्बेडकर के जन्मदिन पर दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में साहब कांशी राम ने भी ऐलान किया कि वो बैलट से ही लड़ना चाहते हैं, लेकिन अगर ब्राह्मणवादी ताक़तें हम पर गैर-संवैधानिक हमला करती हैं, तो उसके लिए हमें बुलेट की भी तैयारी रखनी होगी। मीडिया को लेकर भी इन दोनों नेताओं के एक से विचार थे कि बगैर अपना एक मज़बूत मीडिया बनाये, इस परिवर्तन की लड़ाई को नहीं जीता जा सकता।

“ब्लैक पैंथर” से “दलित पैंथर” तक

19 फरवरी 1965 को मैलकम X की हत्या के बाद अश्वेत आंदोलन की दिशा बदली और 1966 में अमरीका के कैलिफ़ोर्निया राज्य में “बॉबी सील” और “ह्यूई न्यूटन” द्वारा “ब्लैक पैंथर पार्टी” की स्थापना हुई। इसने नस्लभेद की समस्या पर पुरे अमरीका को झकझोड़ कर रख दिया। ठीक इसी की तर्ज पर महाराष्ट्र में नामदेव धसाल और जे वि पवार ने 1972 में “दलित पैंथर” की स्थापना की। यहीं से पहली बार विश्व स्तर पर इन दोनों आंदोलनों में मेलजोल बढ़ा और दुनिया के दो अलग हिस्सों में रह रहे इन दो बड़े समुदायों का आपस में संवाद कायम हुआ। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर “जाती” और “नस्ल” की समस्याओं ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा।

कई मोर्चो पर संघर्ष

इन सभी नेताओं ने राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिवर्तनों को भी बहुत महत्त्व दिया। इस मामले में अफ़्रीकी मूल के लोगों ने अमरीका में एक मिसाल कायम की। चाहे संगीत का क्षेत्र हो, या फिर खेलों का; उनकी कामयाबी पुरे विश्व में शोषितों और वंचितों के लिए प्रेरणा बनी। उनकी सामाजिक एकता भी अमरीका में एक अल्पसंख्यक समुदाय होने के बावजूद, उन्हें एक मज़बूत समूह के तौर पर स्थापित कर चुकी है। एक अश्वेत चाहे किसी भी धर्म या फिर किसी भी अफ्रीकी देश का क्यों न हो, लेकिन अगर मसला उनके साथ हुए अन्याय का हो तो वो चट्टान की तरह एक साथ खड़ा हो जाता है। फिर चाहे शासन -प्रशासन हो या कोई भी और ताक़त, उनकी सामाजिक एकता के सामने सब घुटने टेक देते हैं।

अब तो उनमें एक बहुत बड़ी आर्थिक क्रांति भी जन्म ले चुकी है, जिसमें बहुत सारे युवा अफ़्रीकी व्यवसाई और बुद्धिजीवी आगे आकर उनका नेतृत्व कर रहे हैं। उनके विचारों में अश्वेत इलाकों में जो व्यवसाय हैं, वो उनके द्वारा ही चलाये जाने चाहिए। उनके समाज द्वारा खर्चा गया पैसा, वापस उनके ही समाज में आये जिससे उनकी आर्थिक स्थिति ज़्यादा मज़बूत हो।

मानवता को शर्मसार किया

चाहें नस्ल के कारण हुआ भेदभाव हो या जाती के कारण; दोनों ही मानवता को शर्मसार करते आये हैं और आज भी 21वी सदी में बदकिस्मती से जारी हैं। पहले के मुक़ाबले चाहे यह अब उस खुले रूप में न हों, लेकिन अपने आप को बेहतर और दूसरों को घटिया समझने की मानसिकता आज भी भारत की ब्राह्मणवादी जातियों और यूरोपीय नस्ल के बहुत बड़े वर्ग में ज़िंदा है। भारत में RSS का देश की सत्ता पर पहुँचना जोकि एक ब्राह्मणवादी संगठन है और अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रपति बनना इस बात का सबूत है। ऐसे हालातों में भारत की शोषित जातियों और अफ़्रीकी मूल के अश्वेतों का एक साथ आना और भी ज़रूरी हो जाता है।

आज अमरीका में विश्वविद्यालों में उच्च शिक्षा हासिल करने और रोजगार के सिलसिले में भारत की उत्पीड़ित जातियों  के लोग बहुत बड़ी संख्या में पहुँचे हैं। अफ़्रीकी मूल के लोगों में ही नहीं बल्कि अमरीका और पुरे विश्व में अब भारत में चल रही अमानवीय जाती व्यवस्था के बारे में जागरूकता बढ़ी है। आज भी करोड़ों लोगों को जातीय भेदभाव के कारण ग़ुलामी का जीवन जीना पड़ रहा है,यह बात जगजाहिर हो रही है ।

विदेशों में भी जातीय भेदभाव

यूनाइटेड किंगडम में नस्लीय भेदभाव की ही तरह, जातीय भेदभाव के ऊपर कानून बनाने पर वहाँ की संसद में चर्चा चल रही है। अफ़्रीकी लोगों को तो जाती व्यवस्था के बारे में इतनी जानकारी नहीं है, लेकिन इसके विपरीत अनुसूचित और पिछड़ी जातियां नस्लभेद के विषय से अनजान नहीं हैं। कोई कारण नहीं है कि यह दोनों समुदाय एक दूसरे से कंधे-से-कंधा मिलाकर अपनी लड़ाई न लड़े। अगर यह दोनों आपस में तालमेल बढ़ा पाये, तो इन दोनों को एक नई ऊर्जा और शक्ति मिलेगी।

अब यह भारत की OBC, SC और ST जातियों के बुद्धिजीविओं, चिंतकों और संगठनों की जिम्मेवारी बनती है कि वो आगे बढ़कर अफ़्रीकी मूल के लोगों से संवाद बनाये। इन दोनों संघर्षों को विश्व स्तर पर लेकर जाये ताकि करोड़ों लोग, जो इस भेदभाव के कारण एक नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हुए हैं, वो मान-सम्मान के साथ जी सके।

– सतविंदर मदारा

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