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“मूकनायक” पाक्षिक का पहला अंक 31 जनवरी 1920 को प्रकाशित हुआ था

*अभिप्राय*

(“मूकनायक” पाक्षिक का पहला अंक 31 जनवरी 1920 को प्रकाशित हुआ था, जिसका संवाद किए डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने अभिप्राय नाम से लिखा था।)

हिंदुस्तान के जीव पदार्थ तथा मानव जाति के  चलचित्र की और दर्शक के रूप में देखने पर स्पष्ट रूप से यही दिखाई देगा कि यह देश विषमता की खान है। यहां जीव पदार्थ की विपुलता, उपयुक्तता तथा विशाल जनसमूह में फैली दरिद्रता की विषमता इतनी भयानक है कि उसकी ओर असावधानी में भी ध्यान गए बिना नहीं रहता है। इस देश में रहने वाले आदमियों में व्याप्त विषमता आंखों के सामने साक्षात खड़ी रहती हैं। इन हिंदी जनों में व्याप्त विषमता अनेक स्वरूपों में है सामान्यतः कायिक विषमता के साथ-साथ धर्म शास्त्रों द्वारा निर्मित विषमता यहां है ही।

वैसे ही काले-गोरे, ऊंचे-ठिगने, लंबी नाक-चपटी नाक वाले लोग हैं; साथ ही आर्य-अनार्य, गोंड-खोंड, यवन-द्रविड़, अरबी-इरानी आदि भेद वाले मौजूद हैं। तो कहीं पर जागृत तो कहीं सुप्त अवस्था में तो कहीं स्थाई अवस्था में मौजूद हैं। धार्मिक विषमता कायिक तथा मानव जाति का अनेक शाखाओं की विषमता से कहीं अधिक प्रज्वलित स्थिति में है। कभी-कभी तो धार्मिक विषमता सीमा पर जाने पर रक्त पात में बदल जाती है। हिंदू, पारसी, यहूदी, मुसलमान, ईसाई आदि धार्मिक विषमता के किनारे बने हुए हैं। लेकिन सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर हिंदू धर्म के लोगों में व्याप्त विषमता का स्वरूप जितना कल्पना के बाहर है, उतना ही वह निंदनीय भी है।

यह मांग, यह ब्राह्मण, यह शेणवी, यह मराठा, यह महार, यह चमार, यह कायस्थ, यह पासी, यह कोरी, यह वैश्य आदि अनेकों हिंदू अनेकों जातियां हिंदू धर्म में समाई हुई हैं। एक धर्मीय भावना के बजाय जाति भावना की जड़ें गहराई तक जा चुकी हैं। यह बात हिंदुओं को बताने की कोई आवश्यकता नहीं है।

किसी यूरोपियन सज्जन ने पूछा कि आप कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में अंग्रेज, जर्मन, फ्रेंच, इटालियन आदि अनेक प्रकार के उत्तर मिलने पर संतोष होता है। परंतु हिंदुओं की वैसी स्थिति नहीं है “मैं हिंदू हूं” यह कहने मात्र से किसी को संतोष नहीं होगा। उसे तो अपनी जाति क्या है यह बताना आवश्यक लगता है। यानी अपनी विशेष मान्य पहचान बताने के लिए प्रत्येक हिंदू को अपनी विषमता पग-पग पर पर दिखानी पड़ती है।

हिंदू धर्मावलंबियों में व्याप्त विषमता जितनी अनुपम है उतनी ही वह निंदनीय भी है क्योंकि विषमता पूर्ण आचरण से हिंदू धर्म का जो स्वरूप बनता है वह हिंदू धर्म के शीलाचरण को शोभा नहीं देता है। हिंदू धर्म में समाविष्ट जातियां ऊंच-नीच की भावना से प्रेरित है, यह एकदम स्पष्ट है। हिंदू समाज का यह महल की तरह है  तथा समाज की एक एक जाति यानी महल की एक एक मंजिल है।

परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस महल की सीढ़ियां नहीं है। फलत: एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। जिस मंजिल में जिसने जन्म लिया है उसे उसी मंजिल में ही मरना है। नीचे की मंजिल का आदमी कितना भी लायक क्यों ना हो वह ऊपर की मंजिल में प्रवेश नहीं कर सकता है। इसी भांति ऊपरी मंजिल का आदमी कितना भी नालायक क्यों ना हो उसे नीचे की मंजिल पर ढकेलने की प्रज्ञा किसी के पास नहीं है।

स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो जाति-जाति में व्याप्त ऊंच-नीच की भावना गुण अवगुण की नींव पर खड़ी नहीं है।

ऊंची जाति में जन्मा व्यक्ति कितना भी अवगुणी ही क्यों न हो वह उच्च ही कहलाएगा। वैसे ही निम्न जाति में जन्मा व्यक्ति कितना ही गुणवान क्यों ना हो वह निम्न ही रहेगा।

दूसरी बात यह है कि परस्पर में रोटी-बेटी का व्यवहार न होने के कारण हर एक जाति में अपनेपन का संबंध में होकर पराएपन का संबंध है। इस निकट संबंध को यदि अनदेखा कर भी दिया जाए तब परस्पर के बीच बाह्य व्यवहार पर भी नियंत्रण है। कुछ का व्यवहार दरवाजे तक होता है।

किंतु जो जाति अछूत है, यानी वह जाति जिसके स्पर्श से दूसरी जाति के लोग अपवित्र हो जाते हैं। इस अपवित्रता के कारण बहिष्कृत जाति के साथ अन्य जाति के लोग व्यवहार नहीं रखते हैं। रोटी-बेटी व्यवहार के अभाव ने पराएपन व छूत-अछूत की भावना को इतना सुदृढ़ किया है यह जाति हिंदू होकर भी हिंदू समाज के बाहर ही है, यही कहना पड़ेगा।
इस व्यवस्था के कारण हिंदू धर्मीय ब्राह्मण, गैर ब्राह्मण तथा बहिष्कृत ऐसे तीन वर्ग होते हैं। इस भेदभाव के परिणाम की ओर ध्यान देने पर यह दिखाई देगा कि इस व्यवस्था के कारण विभिन्न जातियों पर विविध परिणाम हुए हैं। सबसे उच्च ब्राह्मण वर्ग को महसूस होता है कि हम भूदेव हैं, समस्त मानव जाति का जन्म हमारी सेवा के लिए ही हुआ है। ऐसी सोच रखने वाले भूदेवों को विषमता लाभदायक ही सिद्ध हुई है। इसलिए स्वयं के बनाए हुए अधिकारों से वे अपनी सेवा करवा कर बिना रोक-टोक आराम से मेवा खा रहे हैं। उन्होंने यदि कुछ काम किया है तो है ज्ञान-संचय तथा धर्म शास्त्रों का निर्माण है। किंतु उन धर्म शास्त्रों को आचार-विचार का प्रबल विरोधी ही कहा जाएगा। यह उदार विचार तथा अनुदार आचरण का तालमेल बैठाने वाले धर्मशास्त्रकार मदांध रहे होंगे, ऐसा लगता है। कारण सचेतन तथा अचेतन वस्तु यह ईश्वर का ही रूप है ऐसा उपदेश करने वाले दार्शनिकों के आचरण में विचित्र विषमता दिखाई देना यह विवेकशील मनुष्य के लक्षण नहीं हैं।

उल्टा सीधा कैसा भी हो, किंतु धर्म शास्त्रों का प्रभाव सामान्य लोगों पर भी कुछ कम नहीं है। हम अज्ञानी लोग अपने हित शत्रु को भूदेव कह कर उसकी पूजा करते हैं, इसे कौन कबूल करेगा? हम लोग विघातक धर्म-भावना की जंजीर से जकड़ कर व शत्रु को मित्र मानकर उसके पैरों में विलीन होकर बैठे हैं, इसका क्या कारण है?

इस बात का निराकरण करने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है। अज्ञानी लोगों द्वारा क्या कुछ करते आएगा? वैसे ज्ञान संचय, ज्ञान का प्रसार यह ब्राह्मणों की बकौली बन गई है। यही धर्म का तत्वज्ञान हो गया है। महारकी (यानी नीच काम) मिलाने का पाप दूसरों को नहीं करना चाहिए, यह सब बताने के पश्चात भी चोरी छिपे ज्ञान प्राप्त कर ज्ञानी बनने का प्रयत्न किया गया। परंपरा से चलते आए आचार विचार को छोड़कर स्वच्छंदता से लिखे गए घातक धर्मशास्त्र तलवार के जोर पर अधर्मीय गैर ब्राह्मणों के सिर मढ़ने का काम इसी ब्राह्मणी काल में हुआ है।

सत्ता तथा ज्ञान दोनों न होने के कारण गैर ब्राह्मण बिछड़ गए उनकी प्रगति नहीं हो पाई। यह निर्विवाद सत्य है। परंतु उनके दुख में दरिद्रता शामिल नहीं थी कारण कि उनके पास खेती, व्यापार, उद्योग व नौकरी करके अपना चरितार्थ चलाने के साधन थे।

परंतु सामाजिक विषमता का बहिष्कृत समाज पर भयानक परिणाम हुआ। वह दरिद्रता, दुर्बलता व ज्ञान की त्रिवेणी में बहते गया।

दीर्घकाल से दासता में फंसे रहने के कारण हीन भावना इन्हें पीछे खींचती रहती है। जो स्थिति है, वही योग्य है, अपने भाग्य में इससे अच्छी स्थिति नहीं आएगी। इस विघातक सोच को पतितों की नजर में लाने के लिए ज्ञान जैसा दूसरा अंजन नहीं है परंतु उसे तो मिर्च मसालों की भांति खरीदना पड़ रहा है। वहीं दरिद्रता के कारण यह सब दुर्लभ हो गया है। कहीं-कहीं तो उसे खरीदने पर वह मिल नहीं पाता है। वजह यह है कि ज्ञान मंदिर में सारे अछूतों को प्रवेश नहीं मिल पाता है।
दरिद्रता के गर्त में डूबे हुए व्यक्ति पर अस्पृश्यता का सिक्का लगने से उसे अर्थाजन के अवसर नहीं मिल पाते हैं। व्यापार उद्योग में शायद ही इनका टिकाव लग पाता है। नसीब आजमा कर देखने पर कहीं जगह नहीं मिल पाने पर उसे जमीन के कंकर पत्थर खा कर गुजारा करना पड़ता है। ऐसे इन अछूत नहीं वरन बहिष्कृत लोगों को इस गर्त में पड़ा हुआ देखकर 33 करोड़ देवता ही नहीं वरन अल्लाह को भी तरस आता होगा। प्रत्येक मनुष्य के मन में हिंदुओं के प्रति तिरस्कार की भावना पैदा होती है। दूसरी ओर जिनकी इंसानियत छीनी गई है ऐसे लोग अपने अछूतपन की समस्या से उबरने का प्रयत्न नहीं करते हैं। इन्हें मनुष्य न कहकर जीव-जंतु ही कहना पड़ेगा।

इन जंजीरों में जकड़े हुए आदमी फिर जंतु की तरह नहीं रहेंगे, तो फिर कैसे रहेंगे? ऐसा कहने वाले यथा स्थितिवादी लोग बहिष्कृत समाज में भी बहुत मिल जाएंगे। दरिद्रता के कारण ज्ञान नहीं है, ज्ञान न होने से बल नहीं है, यह बात तर्कसंगत है। परंतु यह तर्क इंसानियत प्राप्ति के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति को कमजोर बनाता है, इसे भी नहीं भूलना चाहिए। प्रवाह के विरुद्ध दिशा में तैरना ही पुरुषार्थ कहलाता है। संतोष की बात यह है कि इस मनुष्यता की प्राप्ति हेतु आशा का संचार बहिष्कृत समाज में हो रहा है। प्रचलित हिंदू धर्म के घोर अन्यायकारक व्यवहार के कारण हमारे समाज को अस्पृश्य माना गया है। विश्व विधाता को भी न मानने वाले करोड़ों अविवेकी व दुराग्रही जन जब तक इस देश में हैं, तब तक अपना समाज दयनीय अवस्था में ही पड़ा रहेगा। इस बात का एहसास बहिष्कृत समाज के बहुत सारे लोगों को आ गया है, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

विदेशी सरकार अपनी मर्जी अनुसार राजकाज चला रही है, इसका लाभ लेकर सवर्ण हिंदू अछूतों की वास्तविक स्थिति को गलत ढंग से सरकार के समक्ष रखते हैं। जबकि यह बात सरकार के समझ में आ चुकी है। जाति भेद तथा जाति द्वेष से ग्रस्त इस देश में वास्तविक स्वराज्य लाना हो, तब बहिष्कृत वर्ग के स्वतंत्र प्रतिनिधियों को राजसत्ता में पर्याप्त हिस्सा मिलना चाहिए। इस मांग का सवर्ण हिंदुओं ने मुखर विरोध किया है। बहिष्कृत वर्ग ने इसकी शिकायत भी की है। सवर्ण समाज राजनीतिक सत्ता प्राप्त करके विषमता का साम्राज्य यथावत बनाए रखना चाहता है। इस बात को अस्पृश्य समाज ने अच्छी तरह पहचान लिया है, इसे छुपी हुई जागृति की लहर ही कहना पड़ेगा।

हमारे बहिष्कृत समाज पर हो रहे अन्याय तथा भविष्य में होने वाले अन्याय की रोकथाम हेतु उपाय योजना आवश्यक है। उसी भांति भावी उन्नति तथा उस संबंध में वास्तविक स्वरूप की चर्चा के लिए समाचार पत्र जैसा दूसरा मध्यम कोई नहीं है। मुंबई प्रदेश में जो समाचार पत्र निकल रहे हैं उनकी ओर नजर दौड़ाने पर दिखाई देता है कि उनमें से बहुत सारे पत्र विशिष्ट जाति के होकर वह अपनी ही जाति के हितों की बात करते हैं। उन्हें अन्य जाति की परवाह नहीं है। इतना ही नहीं तो वे कभी कभी दूसरी जातियों के प्रति अहितकारी तथा अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं।

ऐसे समाचार पत्रों को हम बताना चाहते हैं कि किसी एक जाति की अवनति हुई, तो उस अवनति का दोषारोपण अन्य जातियों पर लगे बिना रहेगा। समाज एक नौका की तरह है। जिस प्रकार नाव में बैठकर यात्रा करने वाले किसी यात्री ने जानबूझकर दूसरों को नुकसान करने के लिए या भगदड़ मचाने के लिए मजाक के तौर पर या अपने विध्वंसक स्वभाव के कारण दूसरे के कमरे में छेद कर दिया। तब नाव के समस्त यात्रियों के साथ उस विध्वंसक यात्री को पहले नहीं, तो अंत में जल समाधि लेनी ही होगी। ठीक वैसे ही आप एक जाति का नुकसान करते हो तब प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप में नुकसान करने वाली जाति का भी अवश्य ही नुकसान होगा। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है। इसलिए स्वहित साधने वाले समाचार पत्रों को दूसरों का नुकसान करके अपना हित साधने की मूर्खता का मार्ग नहीं चुनना चाहिए।

जिन्हें यह बुद्धि वाद कबूल है ऐसे भी समाचार पत्र निकले हैं। यह बहुत ही गर्व की बात है। इसमें दीन मित्र, जागरूक, डक्कन रयत, विजयी मराठा, ज्ञानप्रकाश, सुबोध पत्रिका प्रमुख हैं। इन समाचार पत्रों में बहिष्कृत समाज की समस्याओं की बहुत चर्चा होती रहती है। परंतु गैर ब्राह्मण समाचार पत्र में आडंबर के कारण अनेक जाति की समस्याओं का जहां विचार मंथन होता है, वहां बहिष्कृत समाज की समस्याओं का पूर्णत: उहापोह होकर पूर्णरूपेण स्थान मिलना संभव नहीं है। ऐसे समय बहिष्कृत समाज की अति विकट स्थिति को देखते हुए उन समस्याओं का पूर्णरूपेण विचार-विमर्श करने के लिए एक स्वतंत्र समाचार पत्र की अति आवश्यकता है। इस बात को तो कोई भी कबूल करेगा। इसी कमी को पूरा करने के लिए इस पाक्षिक का जन्म हुआ है।

अस्पृश्यों के हित-अहित की चर्चा करने के लिए सोमवंशी मित्र, हिंद नागरिक, बिटाल विध्वंसक यह समाचार पत्र निकले तथा बंद भी हो गए। वर्तमान में निकल रहा “बहिष्कृत भारत” जैसे तैसे आगे बढ़ रहा है। यदि पाठकों, वार्षिक शुल्कदाताओं की ओर से उचित प्रोत्साहन मिला तब “मूकनायक” किसी प्रकार न डगमगाते हुए स्वजन सुधार का महत्वपूर्ण कार्य करता रहेगा तथा उचित मार्गदर्शन करता रहेगा। मैं यह आश्वासन देता हूं। मैं विश्वास के साथ कहता हूं कि मेरी बात गलत साबित नहीं होगी इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना निवेदन समाप्त करता हूं।

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