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रामायण ने हिंदुओ को कैसे कट्टरपंथी बनाया और हिन्दुत्व राष्ट्रवाद को आगे लाया 

“मैंने अपने पिता को बताया की मुझे महाभारत का कोई भी किरदार पसंद नहीं आया। मैने कहा, “मुझे भीष्म और द्रोणा पसंद नहीं आया और न ही कृष्णा। भीष्म और द्रोणा कपटी थे। उन्होने एक बात कही और बिलकुल विपरीत ही किया। कृष्णा छल में विश्वाश करता था। उसका जीवन छालों की शृंखला के अलावा कुछ नहीं हैं। राम भी मुझे उतना ही ना पसंद है। शूर्पणखा [शूर्पणखा] व्रतांत में एवं वाली सुग्रीव व्रतांत में उसके आचरण और सीता के प्रति उसके क्रूरतापूर्ण की जांच करें। “मेरे पिता शांत थे और कोई जवाब नहीं दिया। वह जानते थे की यह विद्रोह है।” – डॉ अंबेडकर, बुद्धा और उनका धम्म की अप्रकाशित प्रस्तावना

बीते कल, भारत के राष्टीय टीवी चैनल, सत्तापक्ष के नियंत्रण में, डी डी नेशनल ने रामायण के पुनः प्रसारीत का निर्णय लिया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बहाना बनाया था की यह “सार्वजनिक मांग” स्वरूप प्रारम्भ किया जा रहा है। यह आश्चर्यजनक बात नहीं है की संकट के इस दौर में इस तरह की माँगें आर एस एस मुख्यालय एवं भाजपा सरकार के ब्राह्मणों द्वारा की जातीं हैं, सामन्यत: आर एस एस के एक मोहरे के रूप में काम करते हुए।

रामानन्द सागर द्वारा निर्देशित टेलीविज़न श्रंखला ने न केवल हिंदू (ब्राह्मण) समाज को कट्टरपंथी बनाया बल्कि विभिन्न दंगों एवं हत्याओं का नेतृत्व किया जिसमें बाबरी मस्जिद का विध्वंस शामिल है। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद क्या हुआ और तब से हिन्दू कट्टरपंथ संगठन सामने आए, इस बारे में किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। रामयना टीवी श्रंखला ने समाज को ध्रुवितकर मरम्मत से दूर कर दिया है और दोबारा प्रसारण करने के एक निर्णय के साथ, ऐसे दुष्परिणाम होंगे जिनकी कोई बात नहीं कर रहा है।

कोई आश्चर्य नहीं की कांग्रेस सरकार ने एस टीवी कार्यक्रम को शुरूआत की और भाजपा को इसका अत्यधिक लाभ हुआ और १९९० से यह राजनीतिक लाभ एवं चुनावी सफलता के उद्देश्यपूर्ति का साधक रहा। रामायण का प्रसारण १९८७ में प्रारम्भ एवं १९८८ में पूर्ण हुआ था परंतु इसने भारत को अंधविश्वासों और अनर्थकताओं में वृद्धिकर अंधेरे युग में धकेल दिया। जिन लोगों ने इस श्रंखला में अभिनय किया अक्षरपूजा की गयी और उन्हें देवी देवताओं के समान आसान कर रखा गया। आपसे कहा, ब्राहमणवादी भारत निरर्थक है। राजीव गांधी चाहते थे की रामायण एवं महाभारत जैसी हिन्दू पौराणिक कथाओं पर टीवी श्रंखलाओं का निर्माण हो और प्रसारित की जाएँ। इस वजह से समाज के ध्रुवीकरण में कांग्रेस की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

भाजपा एक कदम आगे बढ़ी और उसने न केवल इसमें हेर फेर की, की कैसे लोग रामायण को समझते हैं अपितु अपनी भेदभावपूर्ण एवं जातिवादी योजनों का विस्तार भी किया। भाजपा ने हिन्दू मुस्लिम शत्रुता के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए टीवी श्रंखलाओं का भरपूर प्रयोग किया और राजनीतिक लाभ लिया। राम को चारों वर्णों का उधारकर्ता एवं अभिभावक के रूप में प्रस्तुत किया। रामायण श्रंखला को विशेष राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवास्था के निर्माण और उनके निर्वाहन के आसपास में केन्द्रीत थी। रमानन्द सागर ने हिन्दुत्व के अंशों का निर्माण किया और यह ब्रहमणवादी नायकत्व के लिए अनिवार्य हिन्दूत्व विचारधारा को बनाए रखने में सफल हुआ। अरविंद राजागोपाल द्वारा लिखित पुस्तक “टेलीविज़न के बाद राजनीति – हिन्दू राष्ट्रवाद और भारत में जनता का नया आयाम” में उल्लेखित है की आरएसएस के भाषणों को भी इन टेलीविज़न श्रंखलाओं में शामिल किया गया है।

रामायण एवं महाभारत जैसे टीवी कार्यक्रमों के प्रसारण के एक दशक में भी ब्रहामाणवादी राजनीतिक दल भाजपा कोई आधार नहीं था। इसके अलावा, यह भी किसो को आश्चर्य नहीं होना चाहिए की रामायण टीवी श्रंखला में अभिनय करने वाले आरएसएस से संबन्धित थे, अयोध्या विवाद / बाबरी विध्वंस के दौरान भाजपा / आरएसएस का समर्थन किया और कांग्रेस एवं भाजपा से विधारक /संसद बने चले गए। रामायण श्रंखला न केवल भाजपा के राम जन्मभूमि आंदोलन को वैधता प्रदान की बल्कि बाबरी मस्जिद के विध्वंश का नेतृत्व भी किया। रामायण और महाभारत के प्रसारण के बाद ही हिंदुत्व राष्ट्रीयवाद का उदय हुआ।

राम किसी भी समाज के लिए आदर्श कैसे हो सकता है? कोई जो शंबुक नाम के दलित को इसलिये मार देता है क्योंकि वह ईश्वर की आराधना कर रहा था। ऐसे जातिवादी व्यक्ति को भगवान के ऊंचे सिंहासन पर कैसे बैठाया जा सकता है? डॉ बाबासाहब अंबेडकर की पुस्तक “हिन्दू धर्म में पहेलियाँ” में राम को “राम और कृष्ण की पहेलियाँ” में अलग किया है। कोई जो अपनी पत्नी को त्याग देता है, अपनी पत्नी को चरित्र साबित करने हेतु अग्नि में प्रवेश करने देता है और जो एक महिला की नाक काटता है, वह समाज का आदर्श कैसे बन सकता है। ऐसे आदर्शों पेश करने से समाज कैसे प्रभावित होगा? किसी भी टीवी श्रंखला के अधिप्रचार शुरू करने से पूर्व ही उसके प्रभावों को समझा एवं अध्ययन किया जाना चाहिए। लेकिन फिर यह एक हिन्दुत्व सरकार से पूछना बहुत अधिक होगा और जब टीवी श्रंखला के इन अधिप्रचायों से हिन्दू राष्ट्र का उद्देश्य पूर्ण होता है।

सीता अगरवाल ने अपनी पुस्तक “हिन्दू धर्म में महिलाओं का नरसंहार” में लिखा है की “राम ने एक छूटे से अपराध के लिए एक महिला की नाक काटने का हिंसक अभ्यास किया, जिससे इस दैवीय दंडविधान को दिव्य स्वीकृति प्रदान की । रामायण में शूर्पणखा को काली द्रविड़ के रूप में वर्णित किया गया है, जिसे राम से प्रेम हो गया था। उसने राम के सामने शादी का प्रस्ताव रखा, परंतु माना कर दिया और अपने भाई लक्ष्मण की ओर निर्देशित किया। इस धर्मपारायण हिन्दू भगवान ने शादी के प्रस्ताव देने जैसे अपराध के लिए तुरंत उसके कानों और नाक को काट दिये । तेजस्वी राम ने इस जघन्न कृत्य के लिए पूरी तरह माफ कर दिया । [एएलएलड़ी १०३६] अन्यथा, राम “आदर्श पति”, महिला जीवन के लिए थोड़ा समान करता, उदाहरणत:, उसने ततक को मात्र इसलिये मार डाला [एएलएलड़ी १०४८] क्युकि वह एक “राक्षसी” थी या एक काली शूद्र महिला थी। उसने मौजूदा क्रूर तरीके से उसे अपंग बनाते हुए शरीर के टुकड़े कर दिये। उसने उसके गुप्तांगों क्षत विक्षत कर दिया और फिर बेशर्मी से उसकी योनि में तलवार को ज़ोर देने के बाद शरीर के एक एक भाग तो टुकड़ों में काटा।”

जैसे की श्रंखलाओं में दिखाया गया है, राम के लिए, की यह सब अपनी पत्नी से प्यार की भावना और उन्हें पाने के बारे में नहीं अपितु यह रावण को पराजित कर अपनी पत्नी को हासिल करने की उपलब्धि के बारे में अधिक था। वह अपनी पत्नी पर विश्वासघात का आरोप लगता है और अपने निर्णय को पितृसत्तात्मक शक्ति के दावे स्वरूप सही ठहराता है। क्या यह मनुस्मृति के अनुरूप नहीं है जो कहता है की एक महिला कभी मुक्त नहीं हो सकती ? इस तरह के ब्राहम्ण “आदर्श पति” थी और इस परिणामस्वरूप प्रसारण के बाद महिला समाज पर अधिक हमले होंगे और प्रतिबंध लगेंगे।

यद्यपि ब्राह्मण पत्थरों को कोरोना वायरस होने से बचाने के लिए पत्थर के देवताओं पर मास्क लगा रहे हैं, वहीं वास्तविक संकट से ध्यान भटकाने के लिए ऐसी जातिवादी और दुर्व्यवहारिक टीवी श्रृंखलाओं के प्रसारण करने से भारत को अधिक नुकसान पहुंचेगा। इस बात का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि राम का अस्तित्व था, इसलिए संकट के दौर में जब दुनिया वायरस को जड़ से मिटाने और लोगों को बचाने के लिए तकनीकी प्रगति की ओर देख रही है, भारत के ब्राह्मण भारतीयों को एक बार फिर अंधेरे युग में धकेल रहे हैं। इस तरह के प्रत्यावर्ती कार्यक्रमों का प्रसारण फिर से लैंगिक भूमिकाओं और अंधविश्वासों को मजबूत करेगा।

टीवी पर आधे नग्न ब्राह्मणों को चमकती जनेऊ पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और यदि कुछ भी हो, तो वैज्ञानिक सोच पर कार्यक्रमों को राष्ट्रीय टीवी पर प्रसारित किया जाना चाहिए। जबकि सरकार को भारत में वायरस की स्थिति को संभालना चाहिए, वहीं हिंदुओं को कट्टरपंथी बनाने के लिए क्षणयान्तर  रहा है। ब्राह्मण धर्म कोरोनावायरस से ज्यादा खतरनाक है और ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकना जरूरी है।

लेखक – परदीप अत्री

Read the original article in English from How Ramayana Radicalized Hindus and Brought Hindutva Nationalism Forefront

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