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शहीद उधम सिंह – ‘मुझे मृत्यु का डर नहीं, मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं’

कुछ समय पहले भारत देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, समय-समय पर अनेकों क्रान्तिवीरों ने देश को आजाद करवाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। भारत भूमि सच्चे वीरों की भूमि है। देश में भगत सिंह, सुखेदव, राजगुरु, सुभाष, आजाद, असफाक उल्ला खां, बिरसा मुण्डा, मतादीन भंगी जैसे हजारों राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियों की पूरी टोली ने अंग्रजों को जड़ से उखाड़ फेंकने में खुद को देश के नाम कर दिया। उन वीरों में उधम सिंह का नाम भी शामिल है।

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 में पंजाब में हुआ। उसके पिता जी का नाम टहल सिंह उर्फ तेजपाल तथा उनकी माता जी का नाम नारायण कौर था। उधम सिंह का बचपन का नाम शेर सिंह तथा उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था। दोनों भाइयों का बचपन अनाथालय में गुजरा। 1917 में बड़े भाई का देहान्त हो गया। 1918 में मैट्रिक के बाद अनाथालय छोड़ दिया।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ ऐसी तारीखें हैं जिन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में घटी घटना को याद करके आज भी अंग्रेजों की क्रूर अत्याचार की तस्वीर हमें झकझोर कर रख देती है। अंग्रेजों ने भारत में रोल्ट एक्ट लागू कर दिया था। इसको काला कानून भी कहा जाता है, जिसे बिना अपील, बिना दलील, बिना वकील का कानून भी कहते हैं। अमृतसर के जलियावालां बाग में रोल्ट एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को एक बैठक का आयोजन किया गया। (जल्ली नामक व्यक्ति का बाग होने के कारण उसका नाम जलियांवाला बाग पड़ा।)

क्योंकि रोल्ट एक्ट के कारण भारतीयों के मूल अधिकारों का हनन हो रहा था। बाग में हो रही सभा के बारे में हंसराज पंडित ने जनरल डायर की मुखबरी की। जनरल डायर अपने सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग में गया और वहां पर जन सभा कर रहे निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरु कर दी। लोग अपनी जान बचाने के लिए कुएं में कूदने लगे, क्योंकि बाग को सैनिकों ने चारों तरफ से घेर लिया था और बाग में आने जाने का एक ही रास्ता था। देखते ही देखते वहां लाशों के ढेर लग गए।

इस सारी घटना के बारे में जैसे ही उधम सिंह को पता चला वह घटनास्थल पर पहंुचा और उसने जनरल डायर की क्रूरता को नजदीक से देखा। जनरल डायर ने ऐसा कोलाहल मचाया था, जिससे सुनने मात्र से ही कंपकपी चढ़ जाती है। इस कत्लेआम ने उधम सिंह के दिल में गहरा घाव कर दिया और खून से रंगी मिट्टी को माथे पर लगाकर इस कत्लेआम का बदला लेने की कसम खाई।

जनरल डायर रिटायरमैंट के बाद लंदन चला गया। लेकिन उधम सिंह के मन में बदले की आग धूं-धूं कर जल रही थी। उधम सिंह लकड़ी के ठेकेदार के साथ अफ्रीका गए, फिर वहां से अमेरिका चले गए। उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। दोबारा भारत में आने पर उन्होंने अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया, जो चारों धर्मों का प्रतीक है।

फिर 1934 में उधम सिंह लंदन गए और वहीं पर वे 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे। लंदन में नौकरी करने लगे। कहते है की एक बार ओ’ड्वायर की लड़की ने पूछा आप यहां क्या करने आए हो, तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं आपके पिता जी को मारने आया हूँ। लड़की ने हँस कर जवाब दिया कि आप तो पागल हो।

लेकिन उसको क्या पता था कि उधम सिंह के दिल में अपने सैंकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेना था। यहां एक बात समझने की है कि एक नौकर अपने मालिक को किसी भी समय मार सकता है, लेकिन उधम सिंह ने उसे छुप कर नहीं मारा। क्योंकि उसे पता था कि यदि वह ऐसा करेगा तो पूरी दूनियां से नौकरों या मजदूरों से विश्वास उठ जाएगा। इसलिए उन्होंने सभा में जनरल ओ’ड्वायर बहुत ही नजदीक से मारा।

उधम सिंह ने अपनी कसम को 13 मार्च 1940 में पूरा किया। आखिरकार सैंकड़ों मासूम लोगों की हत्या का बदला उधम सिंह ने ले लिया था। जनरल ओ’ड्वायर  की हत्या से उनकी 13 अप्रैल 1919 में ली हुई कसम पूरी हुई। एक विशेष अदालत में मुकदमा चला, अदालत में उधम सिंह ने अपने सिर को ऊँचा रखते हुए इस हत्या हो स्वीकार किया और कहा मुझे इस कार्य पर गर्व है।

निर्दोष भारतीयों की हत्या के हत्यारे जनरल ओ’ड्वायर को मारकर मैंने राष्ट्रीय अपमान का बदला लिया। अदालत में उनसे पूछा गया कि आपने केवल जनरल ओ’ड्वायर को ही निशाना क्यों बनाया? उधम सिंह ने जवाब दिया। भारतीय कभी निर्दोष, महिला व बच्चों पर हथियार नहीं उठाते। ऐसे थे हमारे शहीद-ए-आजम उधम सिंह।

अंग्रेजी अदालत ने उधम सिंह को फांसी की सजा सुनाई। उधम सिंह ने फांसी के फंदे को हँसते-हँसते स्वीकार कर लिया। उधम सिंह के इस बलिदान को भारत कभी भी भुला नहीं सकता। उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके दूनिया के अत्याचारियों को संदेश दिया है कि भारतीय वीर अत्याचारियों को बक्शा नहीं करते। उसके बाद अंग्रेजों ने 7 वर्षों में ही भारत को छोड़ दिया।

उधम जीते जी भले ही आजाद भारत में सांस न ले सके पर करोड़ों भारतीयों के दिलों में रहकर वो आजादी महसूस कर रहे होगें। वर्तमान में नेता अपने पूर्वजों की जयन्ती जोर-शोर से मनानें में लाखों रुपये खर्च देते हैं। परन्तु सच्चे क्रान्तिकारी बिरसा मुण्डा, खुदी राम बोस, बहादुर शाह जफर, झलकारी बाई से लेकर सुभाष चन्द्रबोस तक बहुत ही कम याद किया जाता है।

आइये हम सभी को हमारी ओर से नमन करते हैं। भारत में जातिवाद होने के कारण उधम सिंह को भी इतिहास के पन्नों में समेट दिया है। निश्चित तौर पर यह उनकी जाति के कारण ही हुआ है। लगता है साहित्यकारों में भी जातिवाद आ गया है। इसलिए उनकी कलम क्रान्तिकारियों में जाति देखने लगी है। पर मैं तो लिखना चाहूँगा।

उधम सिंह यदि जनरल ओ’ड्वायर को भारत में ही मार देते, जितना उनके बारे में आज लिखा है शायद वो भी नहीं मिलता। उन्होनें जनरल ओ’ड्वायर को लंदन में मारा इसलिए इतिहास मजबूरी में थोड़ा बहुत लिखना पड़ा।

लेखक – जय भगवान चैहान, अध्यक्ष, भारतीय दलित साहित्य अकादमी हल्का उकलाना, जिला हिसार एवं गुरु रविदास समाजसेवी ट्रस्ट बिठमड़ा, हिसार

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