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क्या है, “बहुजन समाज” की सबसे बड़ी जरूरत?

आज, बहुजन समाज की बहुत सारी जरूरतें हैं। लेकिन यह सवाल आम उठता रहता हैं कि आखिर उसकी सबसे बड़ी ज़रूरत क्या है ?

यह एक ऐसा सवाल है, जिसमें बहुजन समाज की सारी समस्याओं का हल छुपा हुआ है। अगर वो एक-एक करके, अपनी सारी ज़रूरतों को पूरा करने में जुट जाए, तो शायद 21वीं सदी इसी काम में गुज़र जाएगी। लेकिन अगर वो अपनी सबसे बड़ी जरूरत को समझ ले, तो सदियों में पूरा हो सकने वाला काम, एक-दो दशक में पूरा हो सकता है।

तो फिर आखिर उसकी सबसे बड़ी जरूरत क्या है ?

इसे समझने के लिए, हमें बहुजन समाज के आंदोलनों की पृष्टभूमि को समझना होगा।

हम देख सकते हैं कि आधुनिक समय में “बहुजन आंदोलन” की शुरुआत, 1848 में महाराष्ट्र से राष्ट्रपिता जोतिराव फुले द्वारा हुई। उसके बाद इसकी कमान, छत्रपती शाहू जी महाराज और अंत में बाबासाहेब अंबेडकर ने संभाली।

देश के कई और हिस्सों में भी, इसे अलग-अलग महापुरुषों का नेत्रत्व मिला; खासकर दक्षिण में नारायणा गुरु और पेरियार का।

इससे यह साफ हो जाता है कि कोई भी समाज तभी आगे बढ़ता है, जब उसमें एक मज़बूत नेत्रत्व उभरता है। नेत्रत्व एक विचारधारा पर चलता है और आंदोलन को जन्म देता है। इससे समाज की तरक्की होनी शुरू होती है। उस नेता के जाने के बाद आंदोलन को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी, उनके अनुयायीयों पर आती है। वो इसमें कितने कामयाब होतें हैं, यह उनकी लायकी और ईमानदारी पर निर्भर करता है। अगर वो इसे चलाने में असफल होते हैं, तो फिर इसे एक नये नेत्रत्व को, नये सिरे से शुरू करना पड़ता है।

इसलिए आज बहुजन समाज की सबसे बड़ी जरूरत, “नेत्रत्व” ही है।

इस विषय पर वैसे तो सभी महापुरुषों ने काफी ज़ोर दिया है। लेकिन जब साहेब कांशी राम ने, बाबासाहेब के आंदोलन को दुबारा अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश शुरू की, तो उन्होंने नेत्रत्व के इस महत्वपूर्ण विषय पर, कई बार अपनी राय रखी।

8 मई, 1980 को जबलपुर, मध्य प्रदेश में बोलते हुए उन्होंने कहा कि,
“आज जरूरत है दस हजार लीडरशिप बनाने की। जरूरत है उसे सामाजिक शिक्षा देने की, जरूरत है उसे मिशनरी भावना से कार्य करने की।”

अपने एक Cadre Camp(कार्यकर्ताओं को विचारधारा समझाने के लिए की जाने वाली मीटिंग) में उन्होंने साफ कहा कि आंदोलन चलाने के लिए एक “Centre Point” यानी की केंद्र बिन्दु का होना बहुत ज़रूरी है। इसका काम एक सक्षम नेत्रत्व करता है, जिसके इर्द-गिर्द आंदोलन खड़े होते हैं और वो अपने समाज को आगे बढ़ाते हैं।

महाराष्ट्र के कार्यकर्ताओं के साथ, दिल्ली की एक बैठक में भी उन्होंने कहा कि, “मूवमेंट में सबसे अहम रोल लीडरशिप का होता है।”

लेकिन इस विषय पर उनका सबसे सटीक और महत्वपूर्ण विश्लेषण, उनकी ऐतिहासिक किताब – चमचा युग में हमें मिलता है। जो उन्होंने पूना पैक्ट के 50 साल पूरे होने पर; 24 सितंबर 1982 को लिखी थी।

“उत्पीड़ित और शोषित भारतीयों को अनेक चीजों की जरूरत है, लेकिन उनकी सबसे अहम जरूरत है – नेत्रत्व।

उनकी आबादी और समस्याओं के पैमाने को देखते हुए, उनकी नेत्रत्व संबंधी जरूरत, Quantitative(बहुत बड़ी) भी है और Qualitative(काबिलीयत) भी।
इतना बड़ा काम करने के लिए नेत्रत्व बहुत काबिल और Imaginative(नए तरीकों वाला), दिलचस्पी लेने वाला, मेहनती, ज्ञानी और जानकार होना चाहिए । उसमें दूरदृष्टि, सहनशीलता और लगन भी होनी ही चाहिए ; यही नहीं – नेत्रत्व को समझदार भी होना चाहिए। उसमें उचित समय का बोध और इस बड़े काम की जरूरतों को पूरा करने के लिए उचित भावना भी होनी चाहिए।

लेकिन बदकिस्मती से पिछली कई शताब्दियों में ब्राह्मणी व्यवस्था ने शूद्रों(मराठा, सैनी, जाट, पटेल, यादव, आदि) और अति-शूद्रों(वाल्मीकि, मांग, महार, चमार, दुसाध, पासी, आदि) में उन गुणों को कभी विकसित ही नहीं होने दिया।

आज भी भारत के ऊंची जाती(ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर) के शासक, उन गुणों को विकसित नहीं होने दे रहे हैं। चमचों को अवसर और बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन सच्चे नेताओं को न सिर्फ मौकों और प्रोत्साहन से वंचित किया जा रहा है बल्कि उन पर तमाम तरह की मुश्किलें और अयोग्यताएं भी लादी जा रही हैं।
इस सबने इनमें नेत्रत्वहीनता की स्थिति पैदा कर दी है।”

साहेब कांशी राम
चमचा युग, 24 सितंबर, 1982

इन सभी उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि साहेब कांशी राम, नेत्रत्व को ही बहुजन समाज की सबसे बड़ी जरूरत समझते थे।

इसे बहुजन समाज की बदकिस्मती ही कह सकते हैं कि उनके जाने के कुछ ही सालों बाद; आज नेत्रत्व का वही सवाल फिर से खड़ा हो चुका है, जिसे उन्होंने बड़ी मेहनत और ईमानदारी से सुलझा लिया था।

हालाँकि एक मजबूत आंदोलन की बुनियाद तो उसकी विचारधारा ही होती है, लेकिन बहुजन आंदोलन में यह काम बाबासाहेब अम्बेडकर ने लगभग मुकम्मल कर दिया था। जो थोड़ी-बहुत कमी-पेशी थी, वो साहेब कांशी राम ने पूरी कर डाली। इसलिए विचारधारा का काम तो अब पूरा हो चुका है। फुले-शाहू-अंबेडकर और दूसरे महापुरुषों के नाम से संगठनों की भी देश और विदेशों मे कोई कमी नहीं है।

अगर कमी है, तो एक ईमानदार और काबिल नेत्रत्व की।

अगर बहुजन समाज को अपनी सभी समस्याओं का हल करना है और आने वाली पीढ़ियों के लिए तरक्की के रास्ते खोलने हैं, तो उसे जल्दी-से-जल्दी इस समस्या का हल ढूँढना होगा।

आज जब मनुवादी ताकतें सत्ता के शिखर पर जा पहुँची हैं और बहुजन समाज की ज़मीने, आरक्षण, रोज़गार; सब एक-के-बाद-एक छीने जा रहे हैं। ऐसे में अगर वो इस मसले को जल्दी हल कर लेता है, तो फिर 21वीं सदी उसकी होगी; लेकिन अगर इसमें देर हुई, तो अगली कई सदियाँ भी उसके हाथ से निकलने वाली हैं।

सतविंदर मनख

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